Sunday, February 7, 2016

मन पंछी

मन पंछी तब लगि उड़ै, विषय वासना माहिं।
प्रेम बाज़ की झपट में, जब लगि आयौ नाहिं।।


अर्थः-जिस प्रकार दाना चुगने वाला पक्षी दाने की तलाश में चहुँओर उड़ता और घूमता फिरता है; वैसे ही मनुष्य का मन भी विषय रसों को प्राप्त करने तथा अन्यान्य अनेक इच्छाओं की पूर्ति हेतु यत्र-तत्र भटकता रहता है। परन्तु वह तभी तक भटकता है, जब तक कि प्रेम रुपी बाज़ कि झपट में नहीं आया। तथा जब प्रेम रुपी बाज़ ने मन पंछी को झपटकर दबोच लिया, तो फिर भटकने भटकाने वाला ही कहाँ शेष रहा?

Friday, February 5, 2016

जीव एक है और दुश्मन पांच...

कबीर बैरी सबल हैं, एक जीव रिपु पाँच।
अपने अपने स्वाद को, बहुत नचावैं नाँच।।

अर्थः-भक्ति मार्ग में पग रखने वाले जीव के मार्ग में बाधायें डालने वाले शत्रु बलवान और शक्तिशाली हैं। एक ओर अकेला जीव है और दूसरी ओर उसके विरुद्ध पांच (काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार) शक्तिशाली शत्रु हैं। ये पांचों ही बड़े क्रूर हैं और जो जीव इनके पंजे में आ जाता है उसे ये पांचो ही अपने अपने स्वार्थ के लिये भांति-भांति के नाच नचाते हैं। इसलिये जीव को भक्ति-मार्ग में बहुत ही संभल कर और इन शत्रुओं से बच कर चलना होगा।

बादशाहों का नामो निशां मिटा...

क्या क्या न बादशाहों का नामो-निशाँ मिटा। हर एक अपने वक्त का नौशीरवाँ मिटा।।
मौसम गया बहार का, रंगं-खिज़ाँ मिटा। जो फूल इस चमन में खिला बेगुमाँ मिटा।।
दरपेश सब के वासते मंज़िल अजीब है। ग़ाफ़िल ब होश बाश, अजल अनकरीब है।।

अर्थः-कैसे कैसे महान चक्रवर्ती सम्राटों का नाम निशान जगत से मिट गया। अपने समय का प्रत्येक नौशीरवां और विक्रमादित्य जैसा पराक्रमी होकर भी अन्ततः नष्ट हो गया। बसन्तऋतु की बहार कुछ दिनों तक अपनी ध्वजा फहराती रही, फिर वह भी मिट गयी और उसका स्थान पतझड़ ने ले लिया। पतझड़ का रंग भी चार दिन से अधिक न टिक सका। इस परिवर्तनशील संसार में किसी को भी स्थायित्व प्राप्त नहीं है। जगत के उपवन में जो भी पुष्प खिला, वह निस्सन्देह एक दिन विनाश की भेंट चढ़ गया। क्योंकि प्रकृति के अटल नियमानुसार सब के लिये एक विचित्र गन्तव्य स्थान की ओर जाना निश्चित है। इसलिये ऐ ग़ाफ़िल मनुष्य! सचेत हो कि मृत्यु सिर पर खड़ी है तथा वह क्षण क्षण तुझसे निकटतर होती जा रही है। क्या खबर कब आकर तुझे दबोच लेगी।

Thursday, February 4, 2016

सतगुरु मिलै तो पाइयै,भक्ति मुक्ति भण्डार।
दादू सहजै देखिये, साहिब का दीदार।।

अर्थः-""जिस जिज्ञासु को अपने मालिक के दर्शनों की अभिलाषा है तो वह पहले सन्त सद्गुरुदेव जी से मिलाप करे-वे ही इसे भक्ति और मुक्ति का अक्षय धन दे देंगे और फिर उसे बिना किसी कठिनाई के प्रभु का दर्शन दीदार हो जायेगा।'' अतः सन्त सद्गुरुदेव जी की सहायता की बड़ी आवश्यकता होती है। इस ब्राहृ-ज्ञान के मार्ग पर पग बढ़ाते हुए जब तक उनका गहरा सम्पर्क प्राप्त न होगा, उनके चरण-कमलों में दृढ़ अनुराग न होगा उनके समीप बैठकर ब्राहृविद्या की गम्भीर गुत्थियों को सुलझाया न जाएगा और उनके बताये हुए सुरत-शब्द-योग के अभ्यास की साधना न की होगी तब तक ऊपर गिनाये हुए गुण केवल पाठ-मात्र होंगे। वे अपने अन्तःकरण में ठहर न सकेंगे। और जब तक सन्त सत्पुरुषों की संगति न मिलेगी और अपने में सद्गुणों की ज्योति न जगेगी तब तक अपने आसन पर बैठना (आत्मस्थिति) असम्भव हो जायेगा।

Wednesday, February 3, 2016

संत उदय संतत सुखकारी

संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इन्दु तमारी।।

अर्थः-""सन्तों का अभ्युदय अर्थात् उनका संसार में शुभागमन सदैव ही सुखकर होता है जैसे चन्द्रमा एवं सूर्य का उदय सम्पूर्ण विश्व के लिये सुखदायक है।'' ऐसे दैवीगुण सम्पन्न मनुष्य उत्तम श्रेणी के मनुष्य हैं। दूसरे प्रकार के मनुष्य वे हैं जो स्वलाभ एवं स्वहित के साथ साथ परहित एवं परलाभ का भी ध्यान रखते हैं। वे मध्यम श्रेणी के मनुष्य हैं। तीसरे वे हैं जो स्वलाभ अथवा स्वहित को ही दृष्टिगत रखते हैं। स्वलाभ अथवा स्वहित के लिये वे दूसरों को हानि पहुँचाने में भी कोई दोष नहीं समझते। ये आसुरीगुण सम्पन्न मनुष्य निम्नश्रेणी के मनुष्य हैं। चौथे वे हैं जो केवल अन्यान्य प्राणियों की हानि की ही सोचते रहते हैं। अन्यों को हानि पहुँचाने के लिये वे अपनी हानि तक करने को तत्पर हो जाते हैं। श्री रामचरितमानस में ऐसे मनुष्यों के लिये वर्णन है।

Monday, February 1, 2016

सतगुरु के उपकार का....

सतगुरु के उपकार का बदला दिया न जाइ।
तीन लोक की सम्पदा, भेंटत मन सकुचाइ।।
जैसे सतगुरु तुम करी, मुझ से कछु न होय।
विष भाँडे विष काढ़ करि, दिया अमी रस मोय।।

अर्थः-सतगुरु के उपकार का बदला नहीं दिया जा सकता। उनके उपकार के बदले में तीन लोक की सम्पदा भेंट करते हुये भी मन में संकोच का अनुभव होता है; क्योंकि उस उपकार की तुलना में तीनों लोक की सम्पत्ति और वैभव भी तुच्छ हैं। शिष्य गुरु के उपकार के मूल्य को जानता समझता है। इसलिये वह प्रार्थना करता है कि ऐ सतगुरु! जो आपने मुझ पर उपकार किया है, उसके बदले में मुझ से कुछ भी नहीं हो कता। आपने तो हमारे विष-भरे मन में से विषैली वासनाओं को निकालकर उनके स्थान पर प्रेमाभक्ति का अमृत भर दिया। भला इससे बड़ा उपकार और क्या हो सकता है?

सद्गुरु की महिमा-भवसागर से तरना


कथा कीरतन कलि विषै, भव सागर की नाव।
कबीर जग के तरन को, नाहीं और उपाव।।

अर्थः-श्री कबीर साहिब के विचारानुसार इस घोर कलिकाल में जब कि चहुँओर दूषित वातावरण दृष्टिगोचर होता है तथा तपस्यादि कठिन साधनों का आश्रय ग्रहण करना असम्भवप्राय प्रतीत होता है; भवसागर से तरने के लिये कथा-कीर्तन ही वह सुदृढ़ नौका है, जो जीवात्मा को पार पहुँचा सकती है। इसे छोड़कर कोई अन्य उपाय अथवा साधन नहीं दिखायी देता, जिसके आधार संसारी प्राणी भव-पार हो सकें।