Friday, March 11, 2016

तू मत जानै बावरे, मेरा है सब कोय।

तू मत जानै बावरे, मेरा है सब कोय।
पिंड प्रान से बँधि रहा, सो अपना नहिं होय।।

अर्थः- ऐ बावले मनुष्य! तू यह मत समझ कि मैं जगत के भोगों और सुख-सामग्री को पाकर उनका मालिक बन गया हूँ और यह सब कुछ मेरा है। नहीं, इस भ्रम में मत रह। अन्यान्य सांसारिक सम्पत्ति का मालिक बनना तो दूर की बात रही; यह तेरा शरीर जो प्राणों की डोरी से बँधा हुआ हर समय तेरे साथ लगा है, यह भी तेरा अपना नहीं हो सकता। क्योंकि यह काल के मुख का ग्रास है और वह इसे एक दिन अवश्य तुझसे छीन ले जावेगा।

Thursday, March 10, 2016

चींटी चावल लै चली, बिच में मिलि गइ दार।

चींटी चावल लै चली, बिच में मिलि गइ दार।
कह कबीर दोउ ना मिलै, इक लै दूजी डार।।


अर्थः-च्यूंटी का उदाहरण देते हुए फरमाते हैं कि वह चावल का दाना ले जा रही थी। मार्ग में उसे दाल का दाना पड़ा हुआ मिल गया। लोभ वश उसने सोचा कि इसे भी ले चलूँ। जब वह उसे उठाने लगी तो चावल गिर पड़ा। उस एक छोटे से मुख में दो दाने तो समा नहीं सकते थे। परन्तु वह उसे भी छोड़ना नहीं चाहती थी। जब वह दोबारा चावल उठाती तो दाल का कण गिर पड़ता। इसी उधेड़ बुन में उसे पर्याप्त समय लग गया। उसकी यह दशा देखकर महापुरुषों ने कथन किया कि दोनों वस्तुएं एक साथ नहीं मिल सकतीं। तुझे हर अवस्था में एक को छोड़ना और दूसरी को लेना होगा।

Wednesday, March 9, 2016

सीस झुकायां गिर पड़े, बहु पापन की पोट।
तातें सीस झुकाइये, लगे न जम की चोट।।
सीस तुम्हारा जायेगा, कर सतगुरु की भेंट।
नाम निरन्तर लीजिये, जम की लगे न फेंट।।
अर्थः-ऐ मित्र! सिर झुकाते ही पापों की गठड़ी के गिर जाने से तू महाकाल की चोट से बच जाएगा-अतः तू सदा अपना सिर सत्पुरुषों के चरणों में झुकाए रख-अपितु अपना सिर उनके समर्पित ही कर दे वरना इसे काल ही ले जायेगा। अगर तू लगातार नाम भक्ति में मग्न रहेगा तो यमराज तेरे निकट भी न फटकेगा।

Monday, March 7, 2016

कोई तो तन मन दुखी

कोई तो तन मन दुःखी, कोई चित्त उदास।
एक एक दुःख सबन को, सुखी सन्त का दास।।

अर्थः-इस संसार में कोई तन से दुःखी है, तो कोई मन से दुःखी है तथा कोई अन्य अपने चित्त में सांसारिक चिन्ताओं को बसाकर दुःखी हो रहा है। तात्पर्य यह कि प्रत्येक व्यक्ति को एक न एक दुःख एक न एक रोग चिमटा हुआ है। परन्तु जो सन्तों महापुरुषों का सच्चा दास अथवा सेवक है, वही वास्तविक अर्थों में सुखी है। इसलिये कि वह महापुरुषों की आज्ञा एवं मौज अनुसार आचरण करता हुआ अपने जीवन को भक्ति के साँचे में ढालता है।

Sunday, March 6, 2016

अरब खरब लौं लच्छमी, उदय अस्त लौं राज।

अरब खरब लौं लच्छमी, उदय अस्त लौं राज।
तुलसी जौ निज मरन है, तौ आवै कौनै काज।।

अर्थः-सन्त तुसली साहिब का विचार है कि चाहे अरबों खरबों के मूल्य का धन एकत्र कर लिया जाये और चाहे सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक अर्थात् जहाँ से सूर्योदय होता है, वहां से लेकर सूर्यास्त की सीमा तक का साम्राज्य भी अपने अधिकार में हो। परन्तु जबकि अपना मृत्यु के मुख में जाना निश्चित है और यह भी सिद्ध है कि मृत्यु-समय ये धन और अधिकार अपनी कुछ भी सहायता नहीं कर सकेंगे; तो फिर इनका लाभ क्या हुआ?

Saturday, March 5, 2016

बिन गुरु भक्ति मोह जग, कैसे काटा जाय।।

पहले गुरु भक्ति दृढ़ करो, पाछे और उपाय।
बिन गुरु भक्ति मोह जग, कैसे काटा जाय।।

अर्थः-जिज्ञासु और भक्ति के अभिलाषी के लिये परमसन्त श्री कबीर साहिब उपदेश करते हैं कि पहले गुरु की भक्ति में दृढ़ हो जाओ, और सब उपाय पीछे करना; क्योंकि जगत का मोह जाल बिना गुरु की भक्ति के नहीं काटा जा सकता। जब तक जगत की मोह ममता का फन्दा जीव के गले में पड़ा रहता है, तब तक सब  साधन निष्फल हो जाते हैं। मोह का फंदा काटने के लिये गुरु की भक्ति अत्यन्त आवश्यक है। मुक्त पुरुष सन्त सद्गुर की सेवा और कृपा के बिना आत्मा पर पड़े हुये मन-माया के बंधन कदापि नहीं कटते। बंधनों के कटे बिना कोई भी भवसागर के पार नहीं उतर सकता।

Thursday, March 3, 2016

तीन लोक चेरी भये

तीन लोक चोरी भई, सबका धन हर लीन्ह।
बिना सीस का चोरवा, पड़ा न काहू चीन्ह।।


अर्थः-परमसन्त श्री कबीर साहिब जी का वचन है कि तीनों लोकों में चोरी 

हो रही है। हर किसी की गाँठ से सुख शान्ति का धन चुरा लिया जाता है 

परन्तु बिना सीस का वह चोर किसी को नज़र नहीं आता।