Saturday, January 23, 2016

जीवन थोरा ही भला....

जिवना थोरा ही भला, जो सत सुमिरन होय।
लाख बरस का जीवना, लेखे धरै न कोय।।

जीवन तो वही उत्तम है जो नाम-सुमिरण में व्यय हो, वह यदि थोड़ा भी है तो भी उत्तम है। इसके विपरीत जो मनुष्य नाम-सुमिरण से वंचित है, वह यदि लाखों वर्षों तक भी जीवित रहे तो उसकी इस दीर्घायु का भी कोई लाभ नहीं। इसीलिये सत्पुरुष फरमाते हैं कि नाम के बिना जीवन मृत्यु के समान, विद्या अविद्या के समान तथा संसार का सुख-दुःख के समान है।

Thursday, January 21, 2016

लाख कोस जो गुरु बसें

लाख कोस जो गुरु बसें, दीजै सुरत पठाय।
सबद तुरी असवार हो, छिन आवै पल जाय।।

निस्सन्देह एक शिष्य अपने आराध्यदेव श्री सद्गुरुदेव जी से लाखों कोसों की दूरी पर रहता है यदि उसकी सुरति की धारा गुरु-चरणों से लगी है तो वह दूर रहता हुआ भी उनकी दया दृष्टि से निहाल हो जाएगा।

कबीर संगत साध की, कटै कोटि अपराध



एक घड़ी आधी घड़ी, आधी सूं से आध।
कबीर संगति साध की, कटै कोटि अपराध।।

अर्थः-परिपूर्ण महापुरुषों की एक पल की शुभ संगति सौ वर्ष के भजन-सुमिरण से बढ़कर और लाभदायक है। फरमाते हैं कि सत्पुरुषों की संगति एक घड़ी अथवा आधी घड़ी अथवा उससे भी आधी घड़ी यदि सच्चे दिल से की जाये तो वह कभी निष्फल नहीं जाती,अपितु करोड़ों अपराधों को नष्ट कर देती है। भाव यह कि परिपूर्ण सन्त सत्पुरुषों की शरण-संगति संजीवनी का काम करती है और समय पर मनुष्य की सहायक होती है।

Tuesday, January 12, 2016

20.01.2016 दोहा

मन भरि के जे बोईयै, घुँघची भर नहीं होय।
कहा हमार मानियो नहीं, जन्म जायेगो खोय।।

अर्थः-इन मानसिक विकारों को जिस कदर भी तरक्की दी जाये, इनसे कुछ भी हासिल नहीं होता। अगर ये बढ़ते-बढ़ते मन भर की मात्रा में भी हो जायें तो भी ये जीव को मुट्ठी भर लाभ तक नहीं पहुँचा सकते। ये जिस कदर ज़्यादा बढ़ेंगे उसी कदर ही इनसे रुहानी नुकसान की उम्मींद है। इसीलिये सन्त जन फरमाते हैं कि ऐ जीव! अगर हमारे सत्उपदेश से लापरवाही करके इन्हीं मानसिक विकारों के फेर में ही पड़े रह गये तो फिर यह कीमती इनसानी जन्म यों ही खोया जायेगा। इसलिये जहाँ तक हो सके जीव को इन मानसिक विकारों से और बुराईयों से किनारा करके सत्पुरुषों की राहनुमाई में चलकर नाम और भक्ति की सच्ची कमाई करके ऊँचे दर्ज़े को प्राप्त करना चाहिये।

19.01.2016 दोहा



मन दिया कहुँ और ही, तन साधों के संग।
कहैं कबीर कोरी गज़ी, कैसे लागै रंग।।

अर्थः-श्री कबीर साहिब जी का कथन है कि जिस प्रकार कोरी गज़ी (कोरे थान) पर रंग नहीं चढ़ सकता, क्योंकि उस पर माँडी चढ़ी रहती है। जब तक उसकी माँडी नहीं उतरेगी, रंग कदापि नहीं चढ़ सकेगा। इसी प्रकार ही कई लोग अपने शरीर तो सत्संग में बेशक रखते हैं, किन्तु उनके मन पर रंग इसलिये नहीं चढ़ सकता कि मन पर नफ़सानियत और खुदगर्ज़ी के स्थूल आवरण चढ़े रहते हैं।